BSP National Party Status : बसपा की राज्यसभा से उपस्थिति अब शून्य होने जा रही है। पार्टी की यूपी विधानसभा व परिषद के साथ लोकसभा में संख्या पहले ही शून्य है।

NOI डेस्क, लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सत्ता पर चार बार काबिज रही बहुजन समाज पार्टी पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। लोकसभा और विधान परिषद में बसपा के सदस्यों की संख्या शून्य होने के बाद राज्यसभा में भी पार्टी सदस्यविहीन हो जाएगी। इससे बसपा का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खतरे में है।

लोकसभा के बाद उत्तर प्रदेश विधान परिषद व विधान सभा में पहले से ही शून्य पर पहुंची बसपा दो माह बाद राज्यसभा में भी शून्य हो जाएगी। पार्टी के एक मात्र राज्यसभा सदस्य रामजी गौतम का कार्यकाल भी 25 नवंबर को समाप्त हो जाएगा।

बसपा के पास एक भी विधायक नहीं है इसलिए पार्टी अब न राज्यसभा और न ही विधान परिषद सदस्य के चुनाव में लड़ने की स्थिति में है। 2022 के विधानसभा चुनाव में बलिया की रसड़ा विधान सभा सीट से पार्टी के इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह जीते थे। हाल ही में उनका निधन हो चुका है। बसपा विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद विधानसभा में भी बसपा की उपस्थिति समाप्त हो चुकी है।

खतरे में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा

राज्यसभा चुनाव के बाद बसपा का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा फिर खतरे में पड़ जाएगा। बसपा की स्थापना वर्ष 1984 में कांशीराम ने की थी। पार्टी को वर्ष 1997 में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला था। चुनाव आयोग ने 2025 में बसपा का राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बरकरार रखा था। अब अगले वर्ष होने वाले यूपी समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव बसपा के राष्ट्रीय पार्टी होने का भविष्य तय कर सकते हैं।  चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं बसपा अध्यक्ष मायावती लोकसभा और राज्यसभा सदस्य भी रहीं और अब वर्ष 2027 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव की तैयारी में लगी हैं।

कम से कम 37 वोटों की दरकार

राज्यसभा में उनके किसी प्रत्याशी को जाने के लिए कम से कम 37 वोटों की दरकार होगी। इतनी बड़ी संख्या में वोट जुटा पाना फिलहाल बसपा के लिए असंभव है। इन हालात में पार्टी का लोकसभा, राज्यसभा के साथ यूपी की विधानसभा और विधान परिषद में कोई सदस्य नहीं बचेगा। इन हालात में बसपा राज्यसभा चुनाव में अपना कोई प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारने का फैसला भी ले सकती है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का कोई भी सांसद नहीं चुना गया था। 

गठबंधन नहीं होने से मुश्किल

दरअसल बसपा ने वर्ष 2019 के बाद किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं किया है। इसकी वजह से उसका राज्यसभा में प्रतिनिधित्व खत्म होने की कगार पर है। गठबंधन होने पर उसे सहयोगी दल के वोट मिल सकते थे, जिसके लिए अब देर हो चुकी है।

डेढ़ दशक से बसपा का सियासी सफर संकट भरा

दरअसल, बीते करीब डेढ़ दशक से बसपा का सियासी सफर संकट भरा रहा है। वर्ष 2019 में बसपा के 10 प्रत्याशी लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बने थे हालांकि तब बसपा ने सपा के साथ गठबंधन किया था। इसके बाद वर्ष 2022 के चुनाव में बसपा के उमाशंकर सिंह बलिया की रसड़ा सीट से जीत हासिल कर पाए थे। वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा का खाता भी नहीं खुला था। चुनाव दर चुनाव बसपा का वोट प्रतिशत भी घटने से पार्टी को दोहरे संकट का सामना करना पड़ रहा है।

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