UP Election 2027: कानपुर सपा में टिकट को लेकर घमासान, विधायक और जिलाध्यक्ष आमने-सामने
कानपुर में विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी में टिकट दावेदारी को लेकर विधायक और जिलाध्यक्ष के बीच खींचतान खुलकर सामने आ गई है। यह आंतरिक कलह पीडीए सम्मेलनों और सार्वजनिक मंचों पर भी दिखाई दे रही है, जिससे चुनावी तैयारियों पर असर पड़ने की आशंका है।
NOI संवाददाता, कानपुर। विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा भले अभी दूर हो, लेकिन समाजवादी पार्टी में टिकट की दावेदारी को लेकर अंदरूनी खींचतान अब खुलकर सामने आने लगी है। हालात ऐसे हैं कि पार्टी के भीतर विधायक और जिलाध्यक्ष आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। हाल ही में आयोजित पीडीए सम्मेलनों ने इस राजनीतिक खींचतान को और स्पष्ट कर दिया है।
कानपुर नगर में पीडीए सम्मेलन के दौरान महानगर अध्यक्ष फजल महमूद किदवई नगर, आर्यनगर, सीसामऊ और गोविंद नगर विधानसभा क्षेत्रों के कार्यक्रमों में पूरे संगठन के साथ सक्रिय नजर आए। लेकिन जैसे ही कैंट विधानसभा क्षेत्र की बारी आई, वह कार्यक्रम से पूरी तरह दूर रहे। कैंट का सम्मेलन क्षेत्रीय विधायक मोहम्मद हसन रूमी के नेतृत्व में आयोजित हुआ। राजनीतिक गलियारों में इसे महज संयोग नहीं माना जा रहा है।
पार्टी नेताओं के बीच चर्चा है कि महानगर अध्यक्ष फजल महमूद स्वयं कैंट विधानसभा से टिकट के इच्छुक हैं, जबकि मौजूदा विधायक होने के कारण मोहम्मद हसन रूमी स्वाभाविक रूप से मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं। ऐसे में दोनों नेताओं के बीच बढ़ती दूरी को टिकट की संभावित लड़ाई से जोड़कर देखा जा रहा है। यह भी चर्चा है कि इससे पहले भी कैंट विधानसभा के कई कार्यक्रमों में महानगर अध्यक्ष की अनुपस्थिति सवाल खड़े करती रही है।
इसी तरह का विवाद हाल ही में कानपुर ग्रामीण में भी सामने आया। पीडीए कार्यक्रम के दौरान बिठूर विधानसभा से टिकट की दावेदार जिला पंचायत सदस्य सोनी पासवान को मंच से नीचे उतरने के लिए कहे जाने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ।
सोनी पासवान ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि जिलाध्यक्ष मुनींद्र शुक्ल ने जातीय आधार पर उनके साथ भेदभाव किया और उन्हें मंच से हटाया। उन्होंने यह भी कहा कि इससे पहले भी कई कार्यक्रमों में उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जा चुका है। हालांकि जिलाध्यक्ष की ओर से इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया गया।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव नजदीक आते ही टिकट की दावेदारी और तेज होगी। ऐसे में यदि संगठन समय रहते इन अंतर्विरोधों को नहीं सुलझा पाया तो इसका असर चुनावी तैयारियों और कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ सकता है। फिलहाल इतना तय है कि समाजवादी पार्टी में टिकट की राह आसान नहीं है और दावेदारों के बीच राजनीतिक संघर्ष अब मंचों से लेकर संगठन तक साफ दिखाई देने लगा है।
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