जंतर-मंतर, जो सालों से लोकतंत्र की आवाज रहा है, दिल्ली पुलिस द्वारा 12 अक्टूबर 2026 को प्रदर्शन स्थल के रूप में डिनोटिफाई कर दिया गया है। यह लेख जंतर-मंतर पर हुए पहले प्रदर्शन, पूर्व के विरोध स्थलों और इस ऐतिहासिक स्थल पर लगे प्रतिबंधों के इतिहास को बताता है।

NOI  डेस्क, नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली के बीचों-बीच स्थित जंतर-मंतर एक ऐसी जगह रही है जो सालों से भारत के लोकतंत्र की आवाज बुलंद करने की जगह रही है।

सालों से यह जंतर-मंतर शोषितों की व्यथा का गवाह रहा है और यहीं से कई ऐसे आंदोलन हुए जिसने कई बार सरकारों को झुकाया और सत्ता परिवर्तन हुए। अब एक बार फिर जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों से रोक लगा दी गई है।

दरअसल 12 अक्तूबर 2026 को दिल्ली पुलिस ने आदेश जारी करते हुए जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में डिनोटिफाई कर दिया है। इसका मतलब ये है कि अब यहां कोई धरना-प्रदर्शन आदि नहीं हो सकेगा।

जंतर-मंतर पर पहला प्रदर्शन कब?

जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों के शुरू होने की कहानी बड़ी दिलचस्प है। संसद भवन से करीब होने के चलते जंतर-मंतर को बेहद खास बनाता है। जो लोग अपने प्रतिनिधियों से मिलकर अपनी बात नहीं कह पाते उनके लिए जंतर-मंतर में प्रदर्शन ही अपनी बात को सरकार तक पहुंचाने का सबसे आसान माध्यम है। जंतर-मंतर पर पहला विरोध प्रदर्शन 1993 में DUSU के अध्यक्ष आशीष सूद ने केंद्र सरकार के एक आदेश के बाद किया था। इसके बाद से यह हजारों छोटे-बड़े प्रदर्शनों का गवाह बन चुका है।

31 जनवरी 2003 के दिल्ली पुलिस के स्टैंडिंग ऑर्डर नंबर 309 के अनुसार जंतर-मंतर पर 5000 से अधिक लोगों का जमावड़ा नहीं हो सकता। इसके साथ ही प्रदर्शनकारी अपने वाहन भी जंतर-मंतर पर नहीं ला सकते। अगर अधिक संख्या होती है तो रामलीला मैदान जाने का प्रावधान था।

जंतर-मंतर से पहले कहां होते थे प्रदर्शन?

जंतर-मंतर से पहले विरोध-प्रदर्शन के लिए राजपथ (अब कर्तव्य पथ) के पास बोट क्लब लॉन सुनिश्चित था। संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, नॉर्थ और साउथ ब्लॉक सभी से पास होने के चलते यह जगह सत्ता को चुनौती देने के लिए उपयुक्त मानी गई थी।

हालांकि जब 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत की अगुवाई में यहां हजारों किसान एक हफ्ते तक डटे रहे। उन्होंने वहीं खाना-पीना बनाया, अपने पशुओं को बांधा तो सरकार हिल गई।

इसके बाद सरकार ने एक कानून लाकर बोट क्लब पर विरोध प्रदर्शन करने पर प्रतिबंध लगा दिया था और इसके बाद जंतर-मंतर को प्रदर्शनकारियों के लिए आधिकारिक स्थल बना दिया। वहीं, बोट क्लब से पहले दिल्ली में विरोध प्रदर्शन अकबर रोड पर हुआ करते थे।

एनजीटी ने प्रदर्शनों पर लगाई रोक

एनजीटी ने साल 2017 में जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन करने पर रोक लगा दी थी। एनजीटी ने कहा था कि इन प्रदर्शनों की वजह से इस जगह की हरियाली खराब हो रही है और इलाके में गंदगी भी फैल रही है।

साथ ही एनजीटी ने लोगों को रामलीला मैदान में प्रदर्शन करने की सलाह दी थी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और कोर्ट ने 2018 में एनजीटी के इस आदेश पर रोक लगाते हुए दिल्ली पुलिस से नई गाइडलाइन जारी करने को कहा था।

कब हुआ जंतर-मंतर का निर्माण

आज भारतीय लोकतंत्र में अपनी महत्वपूर्ण जगह बना चुका जंतर-मंतर हजारों विरोध प्रदर्शनों का गवाह है। दिल्ली के बीचों-बीच स्थित जंतर-मंतर का निर्माण साल 1724 में महाराज जयसिंह द्वितीय ने कराया था। यह एक खगोलीय वेधशाला है।

मोहम्मद शाह के शासन काल में हिन्दू और मुस्लिम खगोलशास्त्रियों में ग्रहों की स्थिति को लेकर बहस छिड़ गई थी, जिसको खत्म करने के लिए सवाई जय सिंह ने जंतर-मंतर का निर्माण करवाया।

उन्होंने दिल्ली के साथ-साथ जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में भी इसका निर्माण कराया था। बताया जाता है कि दिल्ली का जंतर-मंतर समरकंद की वेधशाला से प्रेरित है।

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