लखनऊ के माटीकला महोत्सव में मिट्टी के तवे और कुकर जैसे आधुनिक बर्तन आकर्षण का केंद्र बने हैं, जो पारंपरिक स्वाद को घरों तक पहुंचा रहे हैं।

NOI संवाददाता, लखनऊ। मिट्टी के बर्तनों में पके भोजन की सोंधी खुशबू और पारंपरिक स्वाद अब नए अंदाज में घरों तक पहुंचने को तैयार है। डालीबाग स्थित खादी ग्रामोद्योग बोर्ड परिसर में चल रहे माटीकला महोत्सव में इस बार मिट्टी के दीपक और श्री गणेश-लक्ष्मी की प्रतिमाओं के साथ ऐसे उत्पाद भी आकर्षण का केंद्र बने हैं, जो रसोई की जरूरतों से जुड़े हैं।

कानपुर के नवाबगंज से आए कारीगर सर्वोत्तम तिवारी मिट्टी का तवा, कुकर, गिलास और अन्य बर्तन लेकर पहुंचे हैं। इन उत्पादों के जरिये वह मिट्टी के बर्तनों को आधुनिक रसोई से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

सर्वोत्तम तिवारी के स्टाल पर मिट्टी के तवे और कुकर को देखकर लोग खासा उत्साह दिखा रहे हैं। इनके अलावा मिट्टी के गिलास, कटोरी और दूसरे उपयोगी बर्तन भी उपलब्ध हैं। उनका प्रयास है कि लोग केवल सजावट के लिए ही नहीं, बल्कि रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए भी मिट्टी के बर्तनों को अपनाएं।

धातु और अन्य आधुनिक बर्तनों के बीच मिट्टी के इन उत्पादों की अपनी अलग पहचान है। इनमें पकने वाले भोजन से पारंपरिक सोंधेपन का एहसास मिलता है। यही वजह है कि महोत्सव में आने वाले लोग इन बर्तनों के बारे में जानकारी लेने के साथ उनकी खरीदारी भी कर रहे हैं।

महोत्सव में गोरखपुर के टेराकोटा कारीगर हरिओम आजाद की कला भी लोगों को आकर्षित कर रही है। प्रशिक्षित कई युवा हर महीने 20 से 25 हजार रुपये तक कमा रहे हैं। महोत्सव में दीपावली के लिए मिट्टी के दीपक, श्री गणेश-लक्ष्मी की डिजाइनर प्रतिमाएं और सजावटी सामान भी उपलब्ध हैं।

नरही की नेहा के स्टाल पर 300 से लेकर 3000 रुपये तक की गणेश-लक्ष्मी प्रतिमाएं लोगों को पसंद आ रही हैं। कारीगर पारंपरिक कला को आधुनिक डिजाइन और उपयोगिता से जोड़कर नए बाजार की संभावनाएं तलाश रहे हैं।

300 नई माटीकला इकाइयां स्थापित करने का लक्ष्य

माटीकला बोर्ड के उपमुख्य कार्यपालक अधिकारी एलके नाग ने बताया कि प्रदेश में माटीकला को रोजगार से जोड़ने के लिए 19 जुलाई 2018 को उत्तर प्रदेश माटीकला बोर्ड का गठन किया गया था।

मुख्यमंत्री माटीकला रोजगार योजना के तहत अब तक 1,333 लाभार्थियों को ऋण उपलब्ध कराकर इकाइयां स्थापित कराई गई हैं। चालू वित्तीय वर्ष में 300 नई इकाइयां स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके माध्यम से परंपरागत कारीगरों के साथ युवाओं को भी स्वरोजगार से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

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