Krishna Janmabhoomi: सबूत के रूप में पेश की जाएंगी इतिहास की ये पुस्तकें, मंदिर तोड़कर ईदगाह बनाने का है जिक्र
मथुरा, NOI :- श्रीकृष्ण जन्मस्थान मंदिर को तोड़े जाने की घटना कल्पना मात्र नहीं है। इसके साक्ष्य इतिहास की पुस्तकों में भी मिलते हैं। मुगल बादशाह औरंगजेब का वह फरमान भी है जिसमें मंदिर के श्रीविग्रह को 1670 में आगरा ले जाने का जिक्र है। न्यायालय में श्रीकृष्ण जन्मस्थान और शाही मस्जिद ईदगाह के बीच चल रहे विवाद में यह पुस्तक साक्ष्य भी अहम होंगे। अब तक कई पुस्तकों के ऐसे अंश वाद के साथ दाखिल किए गए हैं। कई अन्य वादी भी ऐसे साक्ष्य न्यायालय में दाखिल करने की तैयारी में हैं। वादियों का दावा है कि न्यायालय में ये साक्ष्य अहम होंगे।
इन पुस्तकों में है जिक्र
औरंगजेबनामा, तारीख-ए-यामीन के साथ आधा दर्जन किताबों का हवाला वाद के साथ दिया गया है। इसमे औरंगजेब द्वारा मंदिर तोड़कर ईदगाह बनाने का जिक्र है। श्रीकृष्ण जन्मस्थान मामले में एक वादी अधिवक्ता महेंद्र प्रताप सिंह न्यायालय में ऐसे कुछ साक्ष्य प्रस्तुत कर चुके हैं। अधिवक्ता ने दावा किया है कि औरंगजेब के समय जन्मस्थान से भगवान के श्रीविग्रह आगरा ले जाकर किला स्थित बेगम साहिबा की मस्जिद की सीढ़ियों में दबाए गए। अपने दावे के पक्ष में उन्होंने जनवरी 1670 का औरंगजेब का फरमान न्यायालय में दाखिल किया। यह फरमान उन्होंने बीकानेर के संग्रहालय से हासिल किया। इसमें औरंगजेब ने जन्मस्थान से भगवान के श्रीविग्रहों को आगरा ले जाने का फरमान जारी किया है।
मुंशी देवी प्रसाद द्वारा लिखी और अशोक कुमार सिंह द्वारा संपादित पुस्तक ‘औरंगजेबनामा’ में भी यही हवाला दिया गया है। औरंगजेब के दरबारी साकी मुस्तैद खान द्वारा लिखी पुस्तक ‘मआसिर-ए-आलमगीरी’ के अंश का भी वाद में प्रमुखता से उल्लेख किया गया है। मूल रूप से फारसी में लिखी इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद सर जदुनाथ सरकार ने किया। अनुवादित पुस्तक का अंश वाद के साथ दायर किया गया है। इसके अलावा वीएस भटनागर द्वारा लिखी पुस्तक ‘इंपरर औरंगजेब एंड डिस्ट्रक्शन आफ टेंपल’ का अंश भी दाखिल किया गया है। इस पुस्तक में भी यहां से श्रीविग्रह ले जाकर बेगम साहिबा की मस्जिद की सीढ़ियों में दफनाने का जिक्र किया गया है।
मथुरा के भव्य कृष्ण मंदिर के लिए मदन मोहन मालवीय का अहम योगदान
श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर आज जो भव्य मंदिर है, वह पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रेरणा की देन है। जब वह मथुरा आए तो मंदिर स्थान को खंडहर के रूप में देख भावुक हो गए। उजाड़ पड़ी ये जमीन तब वाराणसी के रईस पटनीमल के वारिसों के नाम थी। मंदिर बनाने के संकल्प के साथ ही उन्होंने जमीन ली। उन्हीं की प्रेरणा से ट्रस्ट बना और बाद में यहां भव्य मंदिर का निर्माण हुआ।
पंडित मदन मोहन मालवीय जन्मस्थान पर 1940 में आए थे। श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान के सदस्य गोपेश्वर नाथ चतुर्वेदी बताते हैं कि तब मालवीय जी ने श्रीकृष्ण जन्मस्थान के रूप में कटरा केशवदेव की भूमि के स्वामित्व के बारे में लोगों से पूछा। ये भूमि 1815 में अंग्रेजी सरकार से वाराणसी के पटनीमल ने नीलामी में ली थी। मदन मोहन मालवीय ने पटनीमल के वारिसों से संपर्क किया। भूमि बिक्री की बात तय हो गई। पंडित मदन मोहन मालवीय ने जमीन खरीदने को जुगल किशोर बिड़ला से संपर्क किया। जमीन की कीमत 13,400 रुपये तय हुई। गल किशोर बिड़ला के आर्थिक सहयोग से वर्ष 1944 में पटनीमल के वारिसों राय कृष्ण दास और आनंदकृष्ण से जमीन खरीदी गई।
ये भूमि पंडित मदन मोहन मालवीय, गोस्वामी गणेश दत्त, और भीखलाल आत्रेय के नाम पर दर्ज हुई। 1946 में पंडित मदन मोहन मालवीय के निधन के बाद उनकी प्रेरणा से 1951 में ट्रस्ट का गठन हुआ था। 1953 में स्थान को समतल करने की कार सेवा चली। सबसे पहले 1957 में ठाकुर केशवदेव का मंदिर बनना शुरू हुआ, जो 1958 में बनकर तैयार हुआ। चतुर्वेदी ने बताया कि ठाकुर केशवदेव मंदिर का शिलान्यास और उद्घाटन हनुमान प्रसाद पोद्दार ने किया था।
Leave A Comment
LIVE अपडेट
राज्य
Stay Connected
Get Newsletter
Subscribe to our newsletter to get latest news, popular news and exclusive updates.






0 Comments
No Comments