अब दोबारा इस्तेमाल हो सकेगा फैक्ट्रियों का गंदा पानी, IIT कानपुर के शोधकर्ताओं ने विकसित की खास तकनीक
NOI संवाददाता, कानपुर। औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले गंदे पानी के उपचार और दोबारा उपयोग की दिशा में आईआईटी के शोधकर्ताओं ने महत्वपूर्ण तकनीक विकसित की है। शोधकर्ताओं ने स्थानीय स्तर पर उपलब्ध रेत, सौर विकिरण और जिंक ऑक्साइड का इस्तेमाल करते हुए कम लागत वाली ऐसी उपचार प्रणाली तैयार की है, जो औद्योगिक अपशिष्ट जल में मौजूद कार्बनिक प्रदूषकों को कम करने में मदद करती है। इस तकनीक का प्रयोग और परीक्षण जयपुर की टेक्सटाइल कंपनी में पिछले छह साल से किया जा रहा है। तकनीक का पेटेंट भी कराया गया है।
आईआईटी के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. शांतनु भट्टाचार्य के नेतृत्व में विभाग की शोध टीम ने यह प्रणाली विकसित की है। इस प्रणाली में अपशिष्ट जल को कई चरणों से गुजारा जाता है। प्रारंभिक उपचार के बाद पानी को रेत फिल्टर से छाना जाता है। इसके बाद इसे मुख्य फोटोकैटेलिसिस टैंक में भेजा जाता है। इस टैंक में गैल्वेनाइज्ड प्लेन शीट के ऊपर विकसित जिंक ऑक्साइड का इस्तेमाल किया गया है।
सूर्य के विकिरण की मदद से इस टैंक में करीब दो से तीन घंटे तक पानी का उपचार किया जाता है। शोध के दौरान बीओडी यानी जैव रासायनिक आक्सीजन मांग को 156 मिलीग्राम प्रति लीटर से घटाकर 10 मिलीग्राम प्रति लीटर तक लाया गया। वहीं सीओडी यानी रासायनिक आक्सीजन मांग 2400 मिलीग्राम प्रति लीटर से घटकर 125 मिलीग्राम प्रति लीटर रह गई।
उद्योगों की ताजे पानी पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी
शोधार्थी सूरज कुमार के अनुसार यह स्वचालित प्रणाली सेंसर आधारित है। उपचार के अलग-अलग चरणों में पानी के पीएच, टीडीएस (टोटल डिसाल्व्ड सालिड्स) और रंग की निगरानी की जा सकती है। इससे उपचार प्रक्रिया को नियंत्रित करने और पानी की गुणवत्ता पर नजर रखने में मदद मिलती है।
इस प्रणाली में कोएगुलेशन-फ्लोकुलेशन यूनिट भी शामिल है। इसमें रसायनों की सहायता से अपशिष्ट जल में मौजूद स्लज को नीचे बैठाया जाता है और पीएच स्तर को नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है।
शोध टीम मैकेनिकल इंजीनियरिंग के पंकज सिंह व आदित्य चौधरी तथा एमएनआईटी जयपुर की उर्मिला सिंह भी शामिल हैं। शोध टीम के अनुसार इस तकनीक से उपचारित पानी का उपयोग अब जयपुर की लक्ष्मी टेक्सटाइल इंडस्ट्री में कपड़े धोने और पौधरोपण के लिए किया जा रहा है। इससे उद्योगों की ताजे पानी पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
प्रो. भट्टाचार्य के अनुसार फोटोकैटेलिटिक उपचार के बाद पानी को कार्बन फिल्टर से भी गुजारा जाता है, जिससे रेत फिल्ट्रेशन के बाद बच जाने वाले छोटे कणों को हटाया जा सके। इस तकनीक का इस्तेमाल केवल टेक्सटाइल और स्टील उद्योग तक सीमित नहीं है। इसका प्रयोग खाद्य अपशिष्ट से निकलने वाले पानी के उपचार में भी किया गया है। जहां परिणाम आशा के अनुरूप रहे हैं। अब उपचारित अपशिष्ट जल से हाइड्रोजन उत्पादन की संभावनाओं पर काम किया जा रहा है।
इस तकनीक की खासियत यह है कि इसमें सौर ऊर्जा और स्थानीय रूप से उपलब्ध रेत का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे संचालन लागत कम रखने में मदद मिल सकती है।
प्रणाली बीओडी, सीओडी, टीओसी और टीएसएस जैसे प्रदूषण संकेतकों को कम करने तथा पीएच को सुरक्षित सीमा में लाने में सहायक है। उपचारित पानी के औद्योगिक प्रक्रियाओं में पुन: उपयोग से उद्योगों की ताजे पानी की मांग भी घटाई जा सकती है।
शोध टीम के अनुसार इस तकनीक से 10 केएलडी अपशिष्ट जल को शुद्ध करने के लिए स्थापित होने वाले प्लांट की औसत लागत 20 लाख रुपये है जबकि स्थान केवल 200 वर्ग फुट ही चाहिए। संचालन लागत भी 60 हजार रुपये प्रति माह होगी।
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