दिल्ली के आकाश हेल्थकेयर अस्पताल के डॉक्टरों ने मां की फिबुला हड्डी का उपयोग कर छह बच्चों के पैरों का सफलतापूर्वक पुनर्निर्माण किया।

NOI,  नई दिल्ली। जिन बच्चों के पैर काटने की नौबत आ गई थी, उन्हें मां की हड्डी से दोबारा चलने का अवसर मिला है। द्वारका स्थित आकाश हेल्थकेयर सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने मां की फिबुला (पैर के निचले हिस्से की पतली हड्डी) के ग्राफ्ट से बच्चों की टांगों का पुनर्निर्माण किया।

अस्पताल के अनुसार, इस तकनीक का पैरों के पुनर्निर्माण में दुनिया में पहली बार इस्तेमाल किया गया। पांच साल में इस विधि से छह बच्चों का उपचार किया गया और उनके पैर काटने से बचाए गए।

पहले मां की हड्डी से पुनर्निर्माण की इस तकनीक का इस्तेमाल मुख्य रूप से हाथ की सर्जरी में होता था। डॉक्टरों की टीम ने इसे पैरों के पुनर्निर्माण में भी अपनाया और इसके परिणाम सामने आए।

2021 में 16 साल की लड़की से हुई शुरुआत

इस तकनीक की शुरुआत 2021 में 16 साल की लड़की के उपचार से हुई। उसकी जांघ की हड्डी (फीमर) गंभीर संक्रमण के कारण पूरी तरह नष्ट हो गई थी। मेडिकल लिटरेचर में खोज के दौरान डॉक्टरों को पैर के पुनर्निर्माण में मां की हड्डी के इस्तेमाल का उदाहरण नहीं मिला।

इसके बाद लड़की की मां की फिबुला हड्डी से उसकी फीमर का पुनर्निर्माण किया गया। पांच साल बाद भी हड्डी विकसित हो रही है और लड़की सामान्य जीवन जी रही है।

सर्जरी का नेतृत्व आर्थोपेडिक्स एवं रोबोटिक ज्वाइंट रिप्लेसमेंट के निदेशक डॉ. आशीष चौधरी, सर्जिकल आंकोलाजी के निदेशक डॉ. अरुण कुमार गिरी और आर्थोपेडिक्स के कंसल्टेंट डॉ. अभिषेक कुमार सांभरिया ने किया।

विदेशी बच्चों के लिए भी उम्मीद

2022 में 14 साल की एक अन्य बच्ची का उपचार किया गया। इसके बाद उज्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान के चार बच्चों की सर्जरी की गई। इनमें तीन बच्चे कैंसर से पीड़ित थे। उज्बेकिस्तान के पांच साल के बच्चे की जांघ की हड्डी में ट्यूमर था।

उसके देश में पैर काटने की सलाह दी गई थी, लेकिन दिल्ली में मां की हड्डी से पुनर्निर्माण किया गया। एक अन्य 11 वर्षीय बच्चे के घुटने के ऊपर स्थित ट्यूमर के उपचार में भी इस तकनीक का इस्तेमाल किया गया।

मां की हड्डी क्यों है उपयोगी

डॉ. आशीष चौधरी के अनुसार मां की हड्डी का ग्राफ्ट क्षतिग्रस्त हड्डी के खाली हिस्से को भरने के साथ पुनर्निर्माण में मदद करता है। बच्चों में अपनी हड्डी का बड़ा हिस्सा नष्ट होने पर यह विकल्प उपयोगी हो सकता है। हालांकि, इसकी सफलता मरीज की स्थिति, हड्डी की क्षति और सर्जरी के परिणामों पर निर्भर करती है।

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