कानपुर में डॉ. अनिल जोशी का आह्वान, बोले- प्रकृति से दूर होती जीवनशैली मानव अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा
डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने कानपुर में 'प्रकृति पथ यात्रा' के दौरान कहा कि आधुनिक जीवनशैली मानव अस्तित्व के लिए खतरा बन रही है। उन्होंने विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण के आकलन (जीईपी) और प्रकृति के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया।
NOI संवाददाता, कानपुर। प्रकृति ने मनुष्य को जीवन दिया है, सांस लेने के लिए हवा, प्यास बुझाने के लिए पानी और पेट भरने के लिए भोजन दिया है, लेकिन आधुनिक जीवनशैली में मनुष्य उसी प्रकृति से दूर होता जा रहा है, जिस पर उसका अस्तित्व निर्भर है। सुविधाओं और आराम की अंधी दौड़ में ऊर्जा की खपत और कार्बन उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है। जंगल सिमट रहे हैं, नदियां प्रदूषित हो रही हैं और मौसम का चक्र भी असामान्य होता जा रहा है।
इसका असर अब केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव जीवन के सामने भी गंभीर संकट खड़ा कर रहा है। यह बातें पद्म भूषण सम्मानित पर्यावरणविद् डा. अनिल प्रकाश जोशी ने सोमवार को आरबीआइ बैंक के आडिटोरियम में आयोजित कार्यक्रम में कहीं।
उन्होंने कहा कि जल, जंगल, जमीन और पर्यावरण के प्रति जन-जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से निकाली गई प्रकृति पथ यात्रा का मकसद लोगों को प्रकृति से दोबारा जोड़ना है। डा.जोशी ने जैव विविधता के संकट की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि मनुष्य ने अपने स्वार्थ और सुविधाओं के लिए प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ दिया है।
उन्होंने वन्यजीवों के उदाहरण देते हुए कहा कि जिन जीवों को प्रकृति ने पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया था, उनकी संख्या लगातार प्रभावित हुई है। जंगलों में रहने वाले जीवों के स्थान पर मनुष्य ने अपनी पसंद के जीवों को घरों में पालना शुरू कर दिया है। यह स्थिति बताती है कि इंसान प्रकृति को अपनी जरूरत के हिसाब से बदलने में लगा है।
कहा कि प्रकृति के हर जीव का अपना महत्व है। किसी एक प्रजाति के समाप्त होने का प्रभाव पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है। जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं, बल्कि हजारों प्रजातियों के जीवन का आधार हैं। यदि जंगल और वन्यजीव नहीं बचेंगे तो मानव जीवन भी सुरक्षित नहीं रह सकेगा।
कोरोना काल में प्रकृति ने ही दिया था जीवन
डा. जोशी ने कोरोना महामारी का जिक्र करते हुए कहा कि जब पूरी दुनिया में संक्रमण का भय था, तब लोग एक-दूसरे से दूरी बनाकर घरों में कैद थे। उस समय जीवन बचाने के लिए हर व्यक्ति संघर्ष कर रहा था। किसी ने अपने पिता को खोया तो किसी ने अपने परिवार के सदस्य को। लेकिन उस कठिन समय में भी प्रकृति ने मनुष्य का साथ नहीं छोड़ा। सांस लेने के लिए हवा, पीने के लिए पानी और भोजन के लिए धरती ने ही संसाधन उपलब्ध कराए।
कोरोना काल प्रकृति की ताकत और मनुष्य की निर्भरता समझने का अवसर था। हमें यह सवाल खुद से पूछना चाहिए कि संकट के समय प्रकृति ने हमारा साथ दिया, लेकिन क्या हमने कभी प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई? उन्होंने एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति बैक्टीरिया में बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता का उदाहरण देते हुए कहा कि प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने के परिणाम स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी दिखाई दे रहे हैं। इसलिए पर्यावरण संरक्षण को केवल पेड़ लगाने तक सीमित नहीं रखना चाहिए।
जीडीपी के साथ जीईपी का भी हो आकलन
डा. जोशी ने विकास के पैमाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि देश और प्रदेश की आर्थिक प्रगति को केवल जीडीपी से नहीं मापा जाना चाहिए। इसके साथ जीईपी यानी ग्रास एनवायरमेंट प्रोडक्ट का भी आकलन जरूरी है। इसमें यह देखा जाना चाहिए कि किसी क्षेत्र में विकास के साथ पर्यावरण की स्थिति कितनी बेहतर हुई है। कहा कि सरकार जिस वर्ष जीडीपी के आंकड़े जारी करे, उसी वर्ष यह भी बताए कि कितने जंगल बढ़े, कितने पेड़ लगाए गए और उनमें से कितने जीवित बचे। वर्षा जल संचयन से कितना पानी संरक्षित हुआ, नदियों और जलस्रोतों की गुणवत्ता में कितना सुधार आया, मिट्टी में जैविक तत्वों की मात्रा कितनी बढ़ी और हवा कितनी स्वच्छ हुई, इन सभी का हिसाब होना चाहिए।
उन्होंने उत्तराखंड में जीईपी की अवधारणा का उदाहरण देते हुए बताया कि पर्यावरण के योगदान को आर्थिक विकास के साथ जोड़कर देखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि आर्थिक विकास का लाभ तभी सार्थक है, जब वह लोगों के जीवन और प्रकृति दोनों को सुरक्षित रखे। यदि किसी व्यक्ति के पास पैसा तो हो, लेकिन उसे पीने के लिए स्वच्छ पानी, सांस लेने के लिए साफ हवा और खाने के लिए शुद्ध भोजन न मिले तो ऐसे विकास का क्या अर्थ है?
बच्चों के भविष्य के लिए बदलनी होगी जीवनशैली
डा. जोशी ने कहा कि आज हर व्यक्ति को अपने बैंक खाते, मकान, वाहन और खर्च का पूरा हिसाब रहता है, लेकिन कोई यह नहीं सोचता कि उसने जीवन में कितनी सांसें लीं और प्रकृति से कितना कुछ प्राप्त किया। आने वाली पीढ़ियों के सामने पर्यावरण का संकट और गंभीर हो सकता है। हमें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता करनी चाहिए। आज जिस तरह की जीवनशैली अपनाई जा रही है, उसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ सकता है। लोगों से खानपान और दैनिक जीवनशैली पर भी विचार करने की अपील की। कहा कि प्रकृति से दूर होती खाद्य आदतें और अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन भी चिंता का विषय हैं। हमें यह समझना होगा कि भोजन कहां से आता है और उसके उत्पादन में प्रकृति की क्या भूमिका है।
प्रकृति को प्रणाम करना जीवन का हिस्सा बनाएं
अपने संबोधन के अंत में डा. जोशी ने बेहद भावुक अंदाज में कहा कि यदि कोई प्रकृति को समझना चाहता है तो उसे केवल पांच मिनट सांस लेने की प्रक्रिया पर ध्यान देना चाहिए। पांच मिनट सांस न लेने की कल्पना मात्र से मनुष्य को जीवन में हवा का महत्व समझ में आ जाएगा। उन्होंने कहा कि लोग सुबह उठकर मंदिर जाते हैं, भगवान को प्रणाम करते हैं और उनसे अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं। यह अच्छी बात है, लेकिन जिस प्रकृति से हर पल सांस, पानी और भोजन मिलता है, उसे प्रणाम करना भी हमारी दिनचर्या का हिस्सा होना चाहिए।
कहा कि भगवान के दर्शन की प्रतीक्षा करने के बजाय उस प्रकृति का सम्मान करना शुरू करें, जो हर समय हमारे साथ मौजूद है। जल, जंगल, जमीन और हवा को बचाना केवल पर्यावरणविदों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है। प्रकृति के प्रति हमारी चिंता और संवेदनशीलता ही आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की नींव बनेगी। अंत में उन्होंने लोगों से अपनी जीवनशैली का मूल्यांकन करने और प्रकृति संरक्षण को व्यक्तिगत जिम्मेदारी बनाने का आह्वान किया।
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