विधि संवाददाता, लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कहा है कि प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षक अंतरजनपदीय तबादले के लिए आवेदन करते समय किसी खास विद्यालय में तैनाती पाने का अधिकार नहीं जता सकते तथा राज्य सरकार की तबादला नीति के तहत ऐसे तबादलों पर विचार जिले के स्तर पर किया जाना है।

कोर्ट ने जून में जारी राज्य सरकार की तबादला नीति को बरकरार रखते हुए तबादला प्रक्रिया के लिए तैयार किए गए जिलेवार छात्र-शिक्षक अनुपात (पीटीआर) को आरटीई अधिनियम के विपरीत मानने से भी इनकार कर दिया।

यह फैसला न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने ऋषि कटियार सहित तीन शिक्षकों की ओर से दाखिल याचिका खारिज करते हुए सुनाया है। शिक्षकों ने 22 जून के शासनादेश में दर्ज पीटीआर को चुनौती देते हुए कहा था कि आरटीई अधिनियम के तहत पीटीआर की गणना विद्यालयवार और कक्षावार होनी चाहिए।

उनका तर्क था कि जिलेवार पीटीआर के आधार पर तबादले की प्रक्रिया से शिक्षक यह तय करने में सक्षम नहीं होंगे कि उन्हें किस स्थान पर तबादले के लिए आवेदन करना चाहिए। याचियों की नियुक्ति बेसिक शिक्षा विभाग के विद्यालयों में सहायक अध्यापक के पद पर हुई थी।

उनकी तैनाती उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा (अध्यापक) (तैनाती) नियमावली, 2008 के तहत अलग-अलग जिलों में की गई थी। इन नियमों में निर्धारित परिस्थितियों को छोड़कर शिक्षकों के तबादले पर रोक है। हालांकि, राज्य सरकार ने चार जून को विशेष श्रेणियों में अंतरजनपदीय तबादले की अनुमति देते हुए नीति जारी की थी।

इसमें अलग-अलग जिलों में कार्यरत पति-पत्नी के मामलों को भी शामिल किया गया था। नीति के तहत यदि पति-पत्नी दोनों बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षक हैं तो कम पीटीआर वाले जिले में तबादले के लिए आवेदन पर विचार किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा कि आरटीई अधिनियम के तहत निर्धारित पीटीआर और तबादले के लिए तैयार जिलेवार पीटीआर दो अलग-अलग विषय हैं। जिलेवार पीटीआर केवल यह तय करने के लिए तैयार किया गया था कि किन जिलों में शिक्षकों का तबादला किया जा सकता है।

इसका आरटीई अधिनियम के तहत विद्यालयों में अनिवार्य पीटीआर बनाए रखने की वैधानिक आवश्यकता पर कोई असर नहीं है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षकों को तबादले का कोई अंतर्निहित वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है।

उनका अधिकार केवल राज्य सरकार की नीति से उत्पन्न हुआ है और उक्त नीति में तबादले पर जिले के स्तर पर विचार करने का प्रविधान है। कोर्ट ने कहा कि याचियों के किसी कानूनी अधिकार का हनन नहीं हुआ है। इसलिए सरकार की नीति में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।

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