NOI, लखनऊ। वर्ष 2027 के विधान सभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव युवाओं को पार्टी से जोड़ने पर जोर दे रहे हैं। पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के सामाजिक समीकरणों के सहारे सत्ता की वापसी का रास्ता तलाश रही सपा की नजर उन युवा और छात्र समूहों पर भी है, जो स्थापित राजनीतिक दलों से बाहर रहकर मुद्दा आधारित आंदोलन खड़े कर रहे हैं।

सीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रांका से गुरुवार को अखिलेश की करीब डेढ़ घंटे की मुलाकात इसी रणनीति का संकेत मानी जा रही है। इस मुलाकात की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यह कोई अचानक बनी राजनीतिक नजदीकी नहीं है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर सीजेपी के नेतृत्व में हुए बीते दिनों हुए छात्र आंदोलन के दौरान सपा ने लगातार इसे समर्थन दिया था।

सपा सांसद व अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव भी आंदोलन के समर्थन में जंतर-मंतर पहुंची थीं और पार्टी ने सड़क से लेकर संसद तक युवाओं के मुद्दों को उठाया था। आंदोलन की परिणति केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के रूप में हुई थी। इससे सीजेपी जैसे अपेक्षाकृत नए और इंटरनेट मीडिया आधारित युवा नेटवर्क की राजनीतिक क्षमता का संदेश देश की मुख्यधारा की पार्टियों तक पहुंचा।

यहीं से अखिलेश की रणनीति का दूसरा पहलू सामने आता है। सपा के लिए चुनौती केवल अपने पारंपरिक सामाजिक गठजोड़ को बनाए रखना नहीं, बल्कि उस युवा मतदाता तक पहुंचना भी है जिसकी राजनीतिक प्राथमिकताएं जातीय पहचान से आगे शिक्षा, रोजगार, भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक, सरकारी संस्थानों की गुणवत्ता और भविष्य की आर्थिक संभावनाओं से जुड़ रही हैं।

सीजेपी आंदोलन की खासियत भी यही रही कि उसने किसी पारंपरिक जातीय या वैचारिक पहचान के बजाय शिक्षा और जवाबदेही जैसे मुद्दों को केंद्र में रखा। अखिलेश के लिए ऐसे समूहों के साथ संवाद दोहरा राजनीतिक लाभ दे सकता है। पहला, सपा के पुराने सामाजिक आधार के बाहर मौजूद युवा वर्ग में पार्टी की पहुंच बढ़ सकती है।

दूसरा, विपक्ष की राजनीति को केवल सरकार विरोधी या जातीय समीकरणों तक सीमित रहने के बजाय ‘युवा बनाम व्यवस्था’ और ‘अवसर बनाम बेरोजगारी’ जैसे व्यापक मुद्दों से जोड़ा जा सकता है। वर्ष 2027 की चुनावी लड़ाई में जातीय गणित अपनी जगह रहेगा, लेकिन उसके साथ युवा मतदाताओं के मुद्दे निर्णायक विमर्श बना सकते हैं। इस मुलाकात से स्पष्ट है कि सपा यह भी तलाश रही है कि नई पीढ़ी किन मुद्दों पर आंदोलित हो रही है और उस ऊर्जा को चुनावी राजनीति से कैसे जोड़ा जा सकता है।

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