IIT Kanpur को मिली बड़ी कामयाबी, गठिया रोगियों को बार -बार नहीं देनी पड़ेगी दवा, शोधार्थी ने खोजी तकनीक
NOI संवाददाता, कानपुर। गठिया रोगियों को अब बार -बार दवा देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आईआईटी की शोध छात्रा सप्तमी चक्रवर्ती ने एक ऐसी तकनीक का विकास किया है जिससे रोगियों को दी जाने वाली दवा शरीर के रोग प्रभावित हिस्से में ज्यादा देर तक टिकी रहेगी। इससे दवा अपना पूरा असर करेगी और मरीज को ज्यादा लाभ मिलेगा।
आईआईटी की पीएचडी छात्रा सप्तमी चक्रवर्ती ने बताया कि उन्होंने कार्टिलेज-बाइंडिंग ड्रग डिलीवरी सिस्टम का विकास किया है। इससे रोगियों को दी जाने वाली दवा शरीर के जोड़ के अंदर मौजूद कार्टिलेज से चिपककर लंबे समय तक वहीं टिकी रहती है। इससे दवा को बार -बार नहीं देना पड़ता है। इस तकनीक को भारत सरकार का पेटेंट भी मिल गया है।
अपने शोध कार्य को वह संस्थान के मेहता फैमिली सेंटर फार इंजीनियरिंग इन मेडिसिन में प्रोफेसर धीरेंद्र एस. कट्टी के निर्देशन में पूरा कर रही हैं। तकनीक का विकास करने से पहले उन्होंने आस्टियोआर्थराइटिस यानी गठिया रोग की पहचान, बीमारी के नए जैविक लक्ष्यों की खोज समेत अन्य बिंदुओं पर नए अध्ययन किए हैं। इसी के तहत इस परियोजना को अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन की स्वीकृति मिली है।
सप्तमी ने अपने शोध निष्कर्षों को आईआईटी दिल्ली, एससीटीआइएमएसटी (केरल) और दक्षिण कोरिया के इंचियोन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में प्रस्तुत किया है। आईआईटी दिल्ली और एससीटीआईएमएसटी में उन्हें सर्वश्रेष्ठ पोस्टर पुरस्कार भी मिला।
इधर, आईआईटी निदेशक को मिला फेलो आफ द रायल सोसाइटी सम्मान
आईआईटी निदेशक प्रो. मणीन्द्र अग्रवाल को फेलो आफ द रायल सोसाइटी सम्मान मिला है। आईआईटी निदेशक ने कहा कि 360 साल पुरानी संस्था से सम्मान मिलना सुखद और गौरवपूर्ण है। द रायल सोसाइटी के फेलो बने प्रो. अग्रवाल को कंप्यूटर साइंस विज्ञानी के तौर पर वैश्विक प्रतिष्ठा प्राप्त है। उन्हें पद्मश्री सम्मान के साथ ही शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार, इंफोसिस पुरस्कार और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित गोडेल पुरस्कार मिल चुका है। उन्हें क्रिप्टोग्राफी, एल्गोरिदम, कंप्यूटेशनल कांप्लेक्सिटी थ्योरी के क्षेत्र में उत्कृष्ट अनुसंधान के लिए जाना जाता है। उन्होंने आईआईटी कानपुर से ही कंप्यूटर साइंस में 1986 में बीटेक और 1991 में पीएचडी की डिग्री पूरी की। वर्ष 1996 में उन्होंने संस्थान में शिक्षण कार्य शुरू किया और अब निदेशक के पद पर कार्यरत हैं।
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